गांव मदीना: अनाथ बच्चों तक पहुँची अन्नपूर्णा मुहिम, जगी नई उम्मीद

गांव मदीना, जिला सोनीपत (हरियाणा) में भेजी संत रामपाल जी महाराज ने अनाथ बच्चों के लिए मदद 

गांव मदीना (सोनीपत): गांव की कच्ची गलियों से गुजरते हुए जब हम उस छोटे-से घर के सामने पहुंचे, तो पहली नज़र में ही समझ आ गया कि यहां ज़िंदगी आसान नहीं है। टूटा हुआ दरवाज़ा, जर्जर खिड़कियां, और भीतर पसरा सन्नाटा सब कुछ जैसे सालों के संघर्ष की कहानी खुद बयां कर रहा था। यह कोई आंकड़ों वाली खबर नहीं थी, यह उन मासूम चेहरों की दास्तान थी, जो बहुत छोटी उम्र में ही बड़े दुखों का बोझ उठाने को मजबूर हो गए।

मां-बाप के साये से वंचित बचपन: संघर्ष की शुरुआत

इस घर में तीन छोटे-छोटे बच्चे अपनी दादी के साथ रहते हैं। मां कई साल पहले उन्हें छोड़कर चली गई। पिता शराब की लत में ऐसा डूबा कि महीनों तक घर लौटकर नहीं आता। बच्चों के लिए मां-बाप अब सिर्फ यादों में हैं।

दादी वीरमती—जिनकी उम्र और हालात दोनों ख़राब हैं—इन बच्चों का एकमात्र सहारा हैं। लेकिन कुछ महीने पहले एक दुर्घटना में उनका एक पैर कट गया। अब चलना-फिरना भी उनके लिए दर्द और मजबूरी बन चुका है।

सोचिए, एक लाचार दादी, तीन मासूम बच्चे, न कमाने वाला कोई, न नियमित राशन। कई बार हालात ऐसे बने कि बच्चों को भूखे पेट ही सोना पड़ा। दादी की आंखें भर आती हैं जब वह कहती हैं,

“बेटा, कई दिन ऐसे आए जब घर में चूल्हा ही नहीं जला। बच्चों को बहला कर सुला दिया।”

घर की हालत: गरीबी की सजीव तस्वीर

घर के भीतर झांकते ही दिल भारी हो जाता है। एक छोटा-सा कमरा, उसी में रसोई भी। टूटा हुआ बाथरूम का दरवाज़ा, जगह-जगह से उखड़ी जालियां, और फर्श पर बिखरा पुराना सामान। दूसरे कमरे में दरवाज़ा तक नहीं—बस एक खुला सा हिस्सा, जहां कुछ पुराने बर्तन और कपड़े रखे हैं। यह घर नहीं, बल्कि मजबूरी का ठिकाना है।

“पांव कट गया, पर हिम्मत नहीं टूटी”: दादी वीरमती की आपबीती

जब दादी वीरमती से बात होती है, तो उनकी आवाज़ में दर्द के साथ-साथ अजीब-सी स्थिरता भी झलकती है। वे रोते रोते कहती हैं।

“आठ-नौ महीने हो गए पांव कटे। चलना मुश्किल है। लेकिन बच्चों के लिए जीना पड़ता है बेटा।”

उनकी आंखें बच्चों की ओर उठती हैं और फिर झुक जाती हैं।

“इनका बाप दारू पीता है, घर नहीं आता। मां तो कब की चली गई। अब बस भगवान ही मालिक है।”

नई उम्मीद की दस्तक: अन्नपूर्णा मुहिम

इसी अंधेरे में एक दिन उम्मीद की रोशनी पहुंची—अन्नपूर्णा मुहिम। गांव मदीना में जब संत रामपाल जी महाराज के शिष्य पहुंचे, तो उनके साथ सिर्फ राशन नहीं था, बल्कि भरोसा और अपनापन भी था। इस परिवार को मुहिम के अंतर्गत संत रामपाल जी महाराज द्वारा गोद लिया गया। बच्चों और दादी के लिए हर जरूरी चीज़—वह भी सम्मान के साथ—घर तक पहुंचाई गई।

क्या-क्या सहायता मिली: सिर्फ राशन नहीं, पूरा सहारा

इस परिवार को जो सहायता दी गई, वह एक-दो दिन की नहीं, बल्कि जीवन को संभालने वाली थी:

  • 15 किलो आटा
  • 5 किलो चावल
  • 2 किलो दाल
  • 5 किलो आलू
  • 5 किलो प्याज
  • 1 लीटर सरसों का तेल
  • 1 किलो दूध
  • 2 किलो चीनी
  • 1 किलो नमक
  • 1 किलो अचार
  • चाय, हल्दी, मिर्च, जीरा जैसे मसाले
  • नहाने और कपड़े धोने के साबुन, सर्फ

इसके साथ ही बच्चों के लिए—

  • स्कूल बैग
  • स्कूल ड्रेस
  • जूते और मोज़े
  • किताबें

सब कुछ निशुल्क।

“हर महीने मिलेगा”: सहायता की निरंतरता का भरोसा

यह मदद एक बार की नहीं है। अन्नपूर्णा मुहिम के तहत परिवार को एक कार्ड दिया गया है। राशन खत्म होने से दो दिन पहले फोन करने पर फिर से पूरी सामग्री पहुंचाई जाएगी। शिष्यों ने साफ कहा— “जब तक घर में कोई कमाने लायक नहीं हो जाता, तब तक यह सहायता चलती रहेगी।”

यह भी पढ़ें: हरियाणा/रोहतक – बाबरा मोहल्ला: जब दो वक्त की रोटी और बच्चों की शिक्षा बनी पहाड़, तो संत रामपाल जी महाराज बने इस परिवार का एकमात्र सहारा

गांव वालों की प्रतिक्रिया: “ऐसा काम कम ही देखा”

जब गांव मदीना में यह सहायता पहुंची, तो केवल वह परिवार ही नहीं, बल्कि पूरा मोहल्ला इसे देख रहा था। आसपास की महिलाएं, बुज़ुर्ग और बच्चे—सब चुपचाप खड़े थे। किसी की आंखों में तसल्ली थी, तो किसी में हैरानी।

एक बुजुर्ग महिला, जो पास ही रहती हैं, भावुक होकर कहती हैं,

“ये बच्चे बहुत परेशान थे। कई बार भूखे भी रहते थे। आज इनके चेहरे पर खुशी देखी है। ऐसा काम बहुत कम लोग करते हैं।”

एक अन्य महिला बताती हैं कि दादी के पांव कटने के बाद से घर की हालत और बिगड़ गई थी।

“हम जितना कर सकते थे, उतना करते थे, लेकिन पूरा सहारा देना हमारे बस में नहीं था। आज लगा कि कोई सच में इनके साथ खड़ा है।”

गांव में धीरे-धीरे यह बात फैल गई कि मदद करने वाले कोई सरकारी कर्मचारी नहीं, बल्कि संत रामपाल जी महाराज हैं। लोगों के बीच चर्चा होने लगी— जब अपने रिश्तेदार दूर हो गए, तब अजनबी बनकर आए इन लोगों ने परिवार को संभाल लिया

पास-पड़ोस की महिलाएं भी भावुक दिखीं। एक बुजुर्ग महिला बोलीं,

“बच्चे बहुत परेशान थे। आज इनके चेहरे पर खुशी देखी है। बहुत बढ़िया काम किया है।”

संत रामपाल जी महाराज के सेवा-कार्य पर समर्पित दृष्टि

इस पूरी कहानी के केंद्र में संत रामपाल जी महाराज का नाम बार-बार सामने आता है। उनकी प्रेरणा से चल रही अन्नपूर्णा मुहिम सिर्फ भूख मिटाने का अभियान नहीं है। यह सम्मान, आत्मनिर्भरता और मानवीय करुणा का प्रयास है।

जहां समाज अक्सर कमजोर को नजरअंदाज कर देता है, वहां उनके मार्गदर्शन में हजारों परिवारों तक रोटी, कपड़ा, शिक्षा और सहारा पहुंच रहा है। यह सेवा चुपचाप होती है—बिना प्रचार, बिना अपेक्षा। संत रामपाल जी महाराज, परमेश्वर कबीर के अवतार हैं।

उनके मार्गदर्शन में चल रही यह सेवा चुपचाप होती है। न बड़े मंच, न शोर-शराबा, न प्रचार की होड़। जहां समाज अक्सर सबसे कमजोर व्यक्ति को अनदेखा कर देता है, वहीं इस मुहिम के माध्यम से हजारों असहाय परिवारों तक सीधी पहुंच बनाई जा रही है।

संत रामपाल जी महाराज असाधारण संत हैं

ऐसे संत, जिनकी पहचान केवल प्रवचनों से नहीं, बल्कि ज़मीनी सेवा और करुणा से बनती है। उनके मार्गदर्शन में चल रहे कार्य यह दिखाते हैं कि सच्चा संत वही है जो पीड़ा देखकर आगे आए, भूखे को रोटी दे, नंगे को कपड़ा दे और टूटे मन को सहारा दे। संत रामपाल जी महाराज की विशेषता यह है कि उनकी सेवा दिखावे से दूर, निरंतर और सम्मान के साथ होती है, जहां मदद पाने वाला खुद को बोझ नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा के साथ खड़ा महसूस करता है।

उन्होंने समाज को यह समझ दी कि धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि मानवता की रक्षा है। हजारों असहाय परिवारों तक रोटी, शिक्षा और जीवन का भरोसा पहुंचाकर उन्होंने यह सिद्ध किया है कि वस्तव में जिसका कोई नहीं होता उसका भगवान होता है।

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