हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले के बहादुरपुर गांव की गलियों में इन दिनों एक अलग ही चर्चा है। चर्चा किसी राजनीति की नहीं, न ही किसी बड़े वादे की—बल्कि उस मानवीय पहल की है, जिसने एक असहाय परिवार के जीवन में फिर से उम्मीद की लौ जलाई है। यह कहानी है एक ऐसे परिवार की, जो जीवन की कठिन परीक्षा से गुजर रहा था, और उस सेवा-भाव की, जिसने बिना शोर-शराबे के उनका हाथ थामा।
हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले का बहादुरपुर गांव। बाहर से देखने पर यह एक सामान्य सा गांव लगता है, लेकिन इसकी एक गली में छुपी है ऐसी कहानी, जो पूरे समाज को आईना दिखाती है। यह कहानी है एक ऐसे परिवार की, जहां एक हादसे ने कमाने वाला हाथ छीन लिया और बाकी ज़िंदगी मजबूरी में धकेल दी।
एक हादसा जिसने पूरे परिवार को अपाहिज बना दिया
बहादुरपुर गांव का यह परिवार रोज़मर्रा की मेहनत-मज़दूरी पर निर्भर था। परिवार के मुखिया काम पर जाते थे, पसीना बहाते थे और उसी से घर चलता था। लेकिन एक दिन एक गंभीर हादसे ने सब कुछ बदल दिया। चोट इतनी गहरी थी कि अब वे चलने-फिरने और काम करने में असमर्थ हो गए। इलाज, घर का खर्च, बच्चों की ज़रूरतें—सब कुछ जैसे एक साथ भारी पड़ने लगा। अधूरा मकान, सीमित सुविधाएं और अनिश्चित भविष्य—इन सबके बीच परिवार की दिनचर्या किसी तरह “धक्का देकर” चल रही थी। परिवार के मुखिया दिहाड़ी मजदूरी करके घर चलाते थे।
रोज़ की कमाई से ही चूल्हा जलता था। लेकिन एक दुर्घटना ने सब कुछ पलट दिया। हादसे में उनका पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। डॉक्टरों ने साफ कह दिया—अब भारी काम संभव नहीं। चलना-फिरना भी मुश्किल है। जिस आदमी के कंधों पर पूरा घर टिका था, वह खुद सहारे का मोहताज हो गया।
अन्नपूर्णा मुहिम: ज़रूरत तक सीधी पहुंच
ऐसे कठिन समय में संत रामपाल जी महाराज के मार्गदर्शन में चल रही अन्नपूर्णा मुहिम बहादुरपुर पहुंची। यह मुहिम गांव-गांव, शहर-शहर उन परिवारों तक पहुंचती है, जिन्हें सचमुच सहारे की ज़रूरत होती है। बहादुरपुर में मुनिंद्र धर्मार्थ ट्रस्ट (कुरुक्षेत्र) के माध्यम से शिष्यों की टीम इस परिवार के घर तक आई—कोई औपचारिकता नहीं, कोई दिखावा नहीं—बस मदद की सादगी और संवेदनशीलता।
घर की तस्वीर: अधूरा मकान, अधूरी सुविधाएं
परिवार का घर अधूरा है। नहाने और शौच के लिए कच्ची-पक्की व्यवस्था, सीमित संसाधन और चारों ओर संघर्ष की छाप। हादसे के बाद मुखिया की असमर्थता ने परिवार की रीढ़ तोड़ दी। काम का कोई साधन नहीं, आय का कोई स्थिर स्रोत नहीं—ऐसे में हर दिन एक नई चुनौती लेकर आता है। बहादुरपुर में इस परिवार का मकान अधूरा पड़ा है।
न पक्की छत, न ढंग का शौचालय, न सही बाथरूम।
मकान बनते-बनते रुक गया, क्योंकि कमाई रुक चुकी थी।
घर में पांच सदस्य हैं। खाने-पीने की हर चीज़ अब उधार, मदद और इंतज़ार पर टिकी है। मुखिया खुद कहते हैं—
“अब कोई काम नहीं कर सकता… बस जैसे-तैसे दिन निकल रहे हैं।”
परिवार की आवाज़: “बस मजबूरी में चल रहा है”
परिवार के सदस्य बताते हैं कि मदद की जानकारी गांव के ही एक परिचित के ज़रिये मिली। टेलीविजन पर भी इस सेवा-कार्य की झलक देखी थी। मुखिया कहते हैं, “अब कोई काम नहीं कर सकता… बस मजबूरी में दिन कट रहे हैं।” वहीं परिवार की महिला सदस्य भावुक होकर कहती हैं कि इस मदद से उन्हें सांस लेने का मौका मिला है—कम से कम रसोई की चिंता कुछ दिनों के लिए कम हुई है।
परिवार की महिला सदस्य बताती हैं कि कभी-कभी तो समझ नहीं आता कि बच्चों को पहले खिलाएं या बीमार पति की दवा लें। उन्होंने कहा— “घर चलाना बहुत मुश्किल हो गया है। मदद के बिना कुछ भी संभव नहीं।” उनकी आंखों में थकान है, आवाज़ में बेबसी और चेहरे पर जिम्मेदारी का बोझ।
राहत सामग्री: रसोई से सम्मान तक
सेवादार जब घर पहुंचे, तो हालात खुद बोल रहे थे—
टूटी ज़िंदगी, अधूरी दीवारें और खाली रसोई।
अन्नपूर्णा मुहिम के तहत परिवार को पूरा राशन दिया गया:
| क्र.सं. | सामग्री | मात्रा |
| 1 | शुद्ध आटा | 25 किलो |
| 2 | ब्रांडेड चावल | 5 किलो |
| 3 | चना दाल | 1 पैकेट |
| 4 | मूंग दाल | 1 पैकेट |
| 5 | पीली दाल | 1 पैकेट |
| 6 | सरसों का तेल | 1 Ltr. |
| 7 | चीनी | 1 पैकेट |
| 8 | नमक | 1 पैकेट |
| 9 | चाय | 1 पैकेट |
| 10 | हल्दी | 1 पैकेट |
| 11 | जीरा | 1 पैकेट |
| 12 | मिर्च | 1 पैकेट |
| 13 | अचार | 1 पैकेट |
| 14 | आलू | 5 किलो |
| 15 | प्याज़ | 5 किलो |
| 16 | नहाने का साबुन | 1 पैकेट |
| 17 | कपड़े धोने का साबुन | 1 पैकेट |
यह मदद केवल पेट भरने तक सीमित नहीं थी, यह सांस लेने का मौका था। यह केवल राशन नहीं था; यह भरोसा था कि परिवार अकेला नहीं है। शिष्यों ने बताया कि यह सामग्री 15–30 दिनों तक पर्याप्त है, और आगे भी जरूरत पड़ने पर तुरंत सहायता पहुंचाई जाएगी।।
निरंतर सहयोग का आश्वासन
सेवा-टीम ने परिवार को संपर्क कार्ड दिया है, जिस पर मोबाइल नंबर अंकित हैं। जैसे ही सामग्री समाप्त होगी, फोन करने पर उसी दिन नई पैकिंग पहुंचाने का आश्वासन दिया गया है। यह सहयोग तब तक जारी रहेगा, जब तक परिवार में कोई स्थायी सहारा नहीं बन जाता। यह निरंतरता ही इस मुहिम की सबसे बड़ी ताकत है।सेवादारों ने परिवार को साफ कहा—
यह एक बार की सहायता नहीं है। जब तक आपके घर में कोई कमाने वाला नहीं बनेगा, तब तक संत रामपाल जी महाराज आपके साथ खड़े रहेंगे।”
गांव वालों की प्रतिक्रिया: “ये लेने नहीं, देने आए हैं”
गांव के लोगों की प्रतिक्रिया साफ़ और दिल से निकली हुई है। एक ग्रामीण कहते हैं, “पहले साधु-संत चंदा लेने आते थे, पर्ची देते थे। लेकिन ये तो देने आए हैं।” किसी को आश्चर्य है, किसी को संतोष—पर सब मानते हैं कि ऐसी पहल ने गांव में भरोसे का माहौल बनाया है। लोगों का कहना है कि दुर्घटना के बाद इस परिवार की हालत सबने देखी थी, और अब राहत देखकर मन को सुकून मिला है।
सामाजिक प्रभाव: सेवा से संस्कार तक
अन्नपूर्णा मुहिम केवल राशन तक सीमित नहीं है। यह नशा-मुक्त और सात्विक जीवन को भी बढ़ावा देती है। नियम स्पष्ट हैं—लाभार्थियों से अपेक्षा की जाती है कि वे नशा और मांसाहार से दूर रहें। उद्देश्य किसी को दंडित करना नहीं, बल्कि स्वस्थ और संयमित जीवन की ओर प्रेरित करना है। इसके साथ ही शिक्षा-सहायता, बच्चों के लिए ड्रेस-किताबें, आपदाओं (जैसे बाढ़ या महामारी) के समय घर-घर राहत—ये सभी पहल इस अभियान के सामाजिक प्रभाव को गहराते हैं।
संकट में सेवा: कोरोना और बाढ़ के समय की मिसाल
ग्रामीण बताते हैं कि कोरोना काल में, जब कमाई के साधन ठप हो गए थे, तब भी इस मुहिम ने झोपड़ियों और गरीब बस्तियों तक राहत पहुंचाई। बाढ़ के समय भी खाद्य सामग्री और आवश्यक सामान घर-घर दिया गया। इससे लोगों का भरोसा मजबूत हुआ कि सेवा केवल तस्वीरों तक सीमित नहीं, बल्कि ज़मीन पर उतरकर की जाती है।
संत रामपाल जी महाराज: सेवा-प्रेरणा का केंद्र
इस सेवा-यात्रा के केंद्र में संत रामपाल जी महाराज की प्रेरणा बताई जाती है। उनके शिष्य बताते हैं कि दहेज-मुक्त विवाह, रक्तदान शिविर, सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता और मोक्ष-मार्ग का ज्ञान—ये सभी पहल समाज को मानवीय और समतामूलक बनाने की दिशा में हैं। “रोटी, कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और मकान”—यह नारा जरूरतमंदों के लिए केवल शब्द नहीं, बल्कि आश्वासन बनकर पहुंचता है। संत रामपाल जी महाराज , परमेश्वर कबीर का अवतार हैं। संत रामपाल जी महाराज ने अन्नपूर्णा मुहिम के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि अध्यात्म का असली अर्थ सेवा है। यह मुहिम पूरे देश में एक लंबे समय से चल रही है। उनका संदेश साफ है— “कोई भूखा न सोए, कोई बेसहारा न रहे।”
नशामुक्त, सात्विक और अनुशासित जीवन को इस मुहिम की शर्त बनाकर उन्होंने सहायता को सुधार और आत्मनिर्भरता से जोड़ा है।
अन्नपूर्णा मुहिम के नियम और पारदर्शिता
अन्नपूर्णा मुहिम के अंतर्गत स्पष्ट सूचना दी जाती है कि राहत सामग्री उन्हीं जरूरतमंदों को दी जाएगी, जो नशा-मुक्त और अभक्ष्य वस्तुओं से दूर जीवन जीते हैं। यदि कोई लाभार्थी नियमों का उल्लंघन करता पाया गया, तो सहायता रोकी जा सकती है।
- लाभार्थी को पूर्ण रूप से नशामुक्त होना होगा।
- मांस या किसी अभक्ष वस्तु का सेवन वर्जित है।
- यदि राहत मिलने के बाद कोई व्यक्ति इन नियमों का उल्लंघन करता है, तो सहायता तुरंत रोक दी जाएगी।
- खाद्य सामग्री समाप्त होने से दो दिन पहले दिए गए नंबरों पर संपर्क करना अनिवार्य है, ताकि नई आपूर्ति समय पर मिल सके
उम्मीद की रोटी, सम्मान का सहारा
जिस मोड़ पर समाज ने चुप्पी साध ली थी, वहीं संत रामपाल जी महाराज ने अन्नपूर्णा मुहिम के माध्यम से इस परिवार का हाथ थामा। यह साबित करता है कि असली सेवा भाषणों, मंचों या प्रचार में नहीं, बल्कि ज़मीन पर उतरकर जरूरतमंद के दरवाज़े तक पहुंचने में होती है।
आज के समय में संत रामपाल जी महाराज के अतिरिक्त पूरे विश्व में ऐसा कोई संत दिखाई नहीं देता, जिसने लाखों लोगों तक सतज्ञान और सत्यभक्ति पहुंचाने के साथ-साथ उन्हें हर स्तर पर—भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान—का सहारा दिया हो। अन्नपूर्णा मुहिम आज हजारों परिवारों के लिए केवल राहत नहीं, बल्कि जीवन की नई शुरुआत बन चुकी है। और यही इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश है—जब कोई नहीं सुनता, तब भगवान अवश्य सुनता है।

