दिल्ली: टीकरी एक्सटेंशन गड्ढा कॉलोनी में पहुँची अन्नपूर्णा मुहिम, जगी उम्मीद

दिल्ली के टीकरी कलाँ एक्सटेंशन में टीबी से जूझते परिवार के पास पहुँची संत रामपाल जी महाराज जी की अन्नपूर्णा मुहिम 

दिल्ली की चकाचौंध से कुछ ही दूरी पर, टीकरी एक्सटेंशन की गड्ढा कॉलोनी में सुबह की धूप बहुत धीमे-धीमे उतरती है। कच्ची गलियों में धूल के साथ संघर्ष की गंध मिली रहती है। कहीं एक पंखा कराहता है, कहीं सूखे चूल्हे की राख बिखरी है। इसी माहौल में आज हम उस दरवाज़े पर खड़े हैं, जहाँ राहत किसी घोषणा की तरह नहीं, बल्कि चुपचाप पहुँची—इंसानियत की तरह। यह कहानी है एक परिवार की, और उस अन्नपूर्णा मुहिम की, जो भूख से जूझते जीवनों में रोटी का भरोसा लेकर आई।

गांव-शहर की सरहद पर गड्ढा कॉलोनी में टिकी ज़िंदगी

यह कॉलोनी शहर का हिस्सा होते हुए भी शहर से बहुत दूर है। यहाँ रहने वाले लोग रोज़गार, बीमारी और महँगाई—तीनों से एक साथ लड़ते हैं। किराये के एक कमरे में आठ लोगों का परिवार, ऊपर से टीबी जैसी बीमारी, और नीचे खाली जेब। दिल्ली की महँगाई में ₹3000 का किराया भी पहाड़ जैसा लगता है। इसी पृष्ठभूमि में आज राहत पहुँची—बिना शोर, बिना शर्तों के दिखावे के।

टूटती सांसें, झुकी आँखें: पीड़ित परिवार की तस्वीर

कमरे के भीतर एक बुज़ुर्ग माँ बैठी हैं। चेहरे पर झुर्रियाँ नहीं, संघर्ष की रेखाएँ हैं। उनसे हाल पूछा तो आवाज़ काँप गई—
“स्थिति तो बहुत खराब है। रोज़ मांग के लाते हैं, बच्चों को बचा-बचा कर खिलाते हैं।”

परिवार में आठ सदस्य हैं। बेटे चंद्रकांत सिंह छह साल से टीबी से जूझ रहे हैं। काम कर पाना मुश्किल है। बहू आराधना देवी फैक्ट्री में काम करती हैं—₹7–8 हज़ार की कमाई, जिसमें से किराया निकल जाता है। चार बच्चे—कभी आटा होता है तो तेल नहीं, कभी चावल होता है तो नमक नहीं। घर के कोने में बैठी बुज़ुर्ग माँ, जिनका नाम परिवार वाले नहीं बता पाए, धीमी और काँपती आवाज़ में अपनी पीड़ा बताती हैं।

वह कहती हैं कि घर की हालत बहुत खराब है और रोज़ पेट भरने के लिए उन्हें मांगने जाना पड़ता है। जो कुछ भी मिलता है, वह बच्चों को बचा-बचा कर खिला देती हैं। उनके अनुसार परिवार में कुल आठ सदस्य हैं और कई बार ऐसा होता है कि सिर्फ भगवान का नाम लेकर ही रात काटनी पड़ती है। उनका कहना है कि कभी किसी ने आकर हाल तक नहीं पूछा, न कोई मदद मिली।

परिवार के मुखिया चंद्रकांत सिंह, जो पिछले छह वर्षों से टीबी जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं, बताते हैं कि बीमारी के कारण वह काम करने की स्थिति में नहीं हैं। उनकी आँखों से ठीक से दिखाई नहीं देता और शरीर भी साथ नहीं देता। चंद्रकांत सिंह कहते हैं कि उनकी माँ जो कुछ मांग कर लाती हैं, उसी से घर का चूल्हा जलता है।

उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी फैक्ट्री में काम करती हैं और महीने के करीब सात से आठ हज़ार रुपये कमा पाती हैं, लेकिन उसमें से तीन हज़ार रुपये तो सिर्फ कमरे का किराया चला जाता है। उनके चार बच्चे हैं और पाँचवां बच्चा पहले ही शादीशुदा है। चंद्रकांत सिंह ने साफ कहा कि आज तक कोई सरकारी या सामाजिक संस्था उनकी मदद के लिए नहीं आई।

आराधना देवी ही है घर की एकमात्र कमाने वाली सदस्य

परिवार की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठाए आराधना देवी बताती हैं कि वह ही घर की एकमात्र कमाने वाली सदस्य हैं। वह रोज़ फैक्ट्री जाती हैं और जो थोड़ा-बहुत कमा पाती हैं, उसी से बच्चों की ज़रूरतें पूरी करने की कोशिश करती हैं। आराधना देवी कहती हैं कि कभी बच्चों के जूते-कपड़े की चिंता होती है, तो कभी स्कूल के खर्च की। कई बार ऐसा भी हुआ है जब घर में आटा तो होता है लेकिन तेल नहीं, या चावल होते हैं लेकिन नमक तक नहीं होता। उनके शब्दों में, एक औरत ही सबसे बेहतर जानती है कि खाली घर और भूखे बच्चों के साथ दिन कैसे काटा जाता है।

बच्चे ज़्यादा कुछ नहीं बोलते। वे कैमरे से नज़रें चुराते हैं और सवाल पूछने पर चुपचाप ज़मीन की तरफ देखने लगते हैं। इस खामोशी को तोड़ते हुए आराधना देवी बताती हैं कि जब बच्चों को भूख लगती है और घर में कुछ नहीं होता, तो वे रोते भी नहीं, बस चुप हो जाते हैं और आँसू पीकर सो जाते हैं।

चंद्रकांत सिंह ने राहत मिलने के बाद कहा कि इतने वर्षों बाद पहली बार उन्हें यह महसूस हुआ है कि कोई उनकी हालत समझने वाला भी है। वहीं आराधना देवी ने कहा कि अब उन्हें बच्चों के सामने यह डर लेकर नहीं सोना पड़ेगा कि कल खाना मिलेगा या नहीं। परिवार के लिए यह मदद सिर्फ राशन नहीं, बल्कि इज़्ज़त और उम्मीद की वापसी है।

यह पूरा दृश्य बताता है कि यह कोई कहानी नहीं, बल्कि दिल्ली की एक गली में रहने वाले उस परिवार की सच्चाई है, जिसे अब तक किसी ने सुना नहीं था। आज पहली बार उनकी आवाज़ शब्दों में दर्ज हुई है, नाम के साथ, दर्द के साथ और इंसानियत के साथ।

संवाद जो दिल तोड़ते हैं

चंद्रकांत सिंह: “छह साल से टीबी है। माँ मांग के लाती हैं तो खाना बनता है। पत्नी कमाती है, उसी से किराया भरते हैं।”
आराधना देवी: “मैं अकेली कमाने वाली हूँ। बच्चों की ड्रेस, जूते—सब सोचते-सोचते रात हो जाती है।”
बुज़ुर्ग माँ: “भूख लगे तो बच्चे आँसू पीकर सो जाते हैं।”

ये संवाद आँकड़े नहीं, ज़िंदगी की सच्चाई हैं—जो कैमरे के सामने नहीं, दिल के भीतर दर्ज होती हैं।

अन्नपूर्णा मुहिम: जब कोई भूखा न सोए

देशभर में चल रही अन्नपूर्णा मुहिममें संत रामपाल जी महाराज जी का साफ संदेश है—कोई भी भूखा न सोए। इसी संदेश के साथ आज यहाँ राहत पहुँची। पड़ोस में रहने वाले सेवादार मुकेश नागर ने परिवार की स्थिति देखी, आश्रम से संपर्क किया और आज सतलोक आश्रम की टीम मौके पर पहुँची। यह केवल कोई एक राशन खाद्य सामग्री वितरण करने के लिए नहीं बल्कि यह गरीब असहाय उन लोगों के जीवन में जो अंधेरा है उस अंधेरे को मिटाने के लिए वो क्रांति है अन्नपूर्णा मुहिम जो मशाल लेकर निकल पड़ी है।

उन गरीब असहाय लोगों के जीवन में जो अंधियारा फैला हुआ है उसको उज्जवल करने के लिए खबर वो जो आपके हित में हो तो तमाम ये कोशिश ऐसे न्यूज़ चैनल की है कि जो समाज कल्याण के लिए खबर हो वो आपको दिखाई जाए। संत रामपाल जी महाराज जी के द्वारा जो देश भर में यह मुहिम चलाई जा रही है अन्नपूर्णा मुहिम इसके तहत महाराज जी ने कहा है कि कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं सोना चाहिए।

अन्नपूर्णा मुहिम के अंतर्गत राहत सामग्री केवल उन्हीं जरूरतमंद व्यक्तियों को दी जाएगी जो पूर्ण रूप से नशा मुक्त जीवन जीते हैं और मांस अथवा किसी भी प्रकार की अभक्ष वस्तुओं का सेवन नहीं करते। यदि कोई लाभार्थी नशा करता है या मांसाहार करता है तो उसे राहत सामग्री प्राप्त करने से पूर्व इन सभी बुराइयों को त्यागना अनिवार्य होगा। यदि कोई लाभार्थी द्वारा सामग्री प्राप्त करने के पश्चात नशा अथवा मांस आदि का सेवन करते हुए पाया गया तो उसकी सहायता तुरंत प्रभाव से बंद कर दी जाएगी।

यह भी पढ़ें: बिहार, दरभंगा ज़िला, गांव: बरियौल (केवटी प्रखंड) में आई संत रामपाल जी महाराज की अन्नपूर्णा मुहिम

राहत का पूरा विवरण: रसोई से जीवन तक

जब अन्नपूर्णा मुहिम के तहत राहत सामग्री घर पहुँची, तो बुज़ुर्ग माँ की आँखों में पहली बार सुकून दिखाई दिया। उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा कि आज उन्हें ऐसा लग रहा है जैसे भगवान खुद उनके घर आ गए हों। उन्होंने भरोसे के साथ कहा कि अब उन्हें कहीं भीख मांगने नहीं जाना पड़ेगा, क्योंकि अब सहारा मिल गया है।

 सेवादारों ने बताया कि परिवार को पूरी रसोई का प्रबंध दिया गया—

क्र.सं.सामग्री (Product)मात्रा (Quantity)
1आटा25 किलो
2चावल5 किलो
3दालें (चना, मूंग, काली दाल)500-500 ग्राम
4आलू5 किलो
5प्याज़5 किलो
6सरसों का तेल2 लीटर
7चीनी4 किलो
8नमक, हल्दी, मिर्च, जीरा1-1 पैकेट
9चाय पत्ती1 पैकेट
10दूध पाउडर1 डिब्बा
11साबुन और सर्फ1-1 पैकेट
12निशुल्क गैस सिलेंडर1

यह केवल राशन नहीं, आने वाले दिनों का भरोसा है।

निरंतरता का आश्वासन: मदद एक दिन की नहीं

परिवार को एक सहायता कार्ड दिया गया। निर्देश साफ हैं—राशन या दवा खत्म होने से एक दिन पहले कॉल, और अगले दिन सामग्री उपलब्ध। टीबी की दवाइयों से लेकर बच्चों की ज़रूरतों तक—सब शामिल। सेवादार बिट्टू दास बताते हैं कि यह सहायता तब तक जारी रहेगी, जब तक परिवार आत्मनिर्भर न हो जाए।

पड़ोस की आवाज़: ‘आज तक कोई नहीं आया’

पड़ोसी सुषमा तिवारी कहती हैं, “लॉकडाउन के बाद कोई नहीं आया। आज पहली बार किसी ने घर तक राशन दिया।”
एक अन्य पड़ोसी भावुक होकर बोले, “इस महँगाई में सिलेंडर देना छोटी बात नहीं। ऐसे संत हमने नहीं देखे।” आज इस गली में चर्चा किसी राजनीति की नहीं, उम्मीद की है। महिलाएँ, बुज़ुर्ग—सब यह देख रहे हैं कि मदद घर तक पहुँची। यह दृश्य बताता है कि सेवा अगर ईमानदारी से हो, तो समाज में भरोसा लौटता है।

पड़ोस की एक अन्य महिला ने बताया कि यह परिवार अक्सर बहुत चुपचाप रहता था। बच्चों को कभी खेलते या हंसते हुए नहीं देखा जाता था। कई बार बच्चों को भूखे पेट सोते हुए भी देखा गया है, लेकिन मजबूरी ऐसी थी कि कोई खुलकर मदद नहीं कर पाता था। उन्होंने कहा कि आज जब इस परिवार के घर में राशन आया है, तो पूरे मोहल्ले को ऐसा लग रहा है जैसे किसी एक घर में नहीं, बल्कि पूरे इलाके में राहत पहुंची हो।

इसी दौरान मोहल्ले के एक बुज़ुर्ग व्यक्ति भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि आज के समय में अपने सगे रिश्ते भी साथ छोड़ देते हैं, लेकिन यहां बिना किसी स्वार्थ के पूरे परिवार की जिम्मेदारी ली गई है। बोलते-बोलते उनकी आंखें भर आईं और उन्होंने कहा कि इस महंगाई में गरीब के घर तक राशन और गैस पहुँचाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। कुल मिलाकर, पड़ोसियों का मानना था कि यह मदद सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे इलाके के लिए उम्मीद का संदेश है। लोगों ने कहा कि अगर ऐसी सहायता लगातार मिलती रही, तो बहुत से बेसहारा परिवार दोबारा सम्मान के साथ जी पाएंगे।

संत रामपाल जी महाराज: सेवा, करुणा और सामाजिक परिवर्तन

इस पूरी मुहिम के केंद्र में संत रामपाल जी महाराज का वह दृष्टिकोण है, जिसमें सेवा केवल दान नहीं, कर्तव्य है। दहेज-मुक्त विवाह, नशामुक्त जीवन, शिक्षा-सहायता—इन पहलों के साथ अन्नपूर्णा मुहिम भूख के खिलाफ एक शांत क्रांति है। यहाँ मदद दिखावे के लिए नहीं, जीवन सँवारने के लिए है। संत रामपाल जी महाराज परमेश्वर कबीर का अवतार हैं। 

टूटे परिवार से नई उम्मीद तक

संत रामपाल जी महाराज द्वारा शुरू किया गया कार्य केवल सेवा नहीं, बल्कि समाज को नई चेतना देने वाला एक युगांतकारी अभियान है। उन्होंने अपने कर्मों से यह सिद्ध कर दिया है कि सच्चा धर्म न तो केवल मंदिरों में सीमित है और न ही लंबे प्रवचनों में, बल्कि भूखे पेट को रोटी देना, नंगे तन को कपड़ा देना और टूटे हुए इंसान को सम्मान के साथ जीने का हक़ दिलाना ही वास्तविक भक्ति है। अन्नपूर्णा मुहिम के माध्यम से उन्होंने समाज के उन चेहरों तक हाथ बढ़ाया है, जिन्हें अक्सर व्यवस्था और समाज दोनों ने अनदेखा कर दिया—नेत्रहीन बुज़ुर्ग, बेसहारा महिलाएं, अनाथ बच्चे और घोर गरीबी में जी रहे परिवार।

सबसे विशेष बात यह है कि यह सहायता क्षणिक नहीं, बल्कि तब तक चलने वाली है जब तक व्यक्ति आत्मनिर्भर होकर अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए। यह तथ्य कि इतने व्यापक, अनुशासित और करुणा से भरे सेवा कार्य का संचालन वे विपरीत परिस्थितियों में रहते हुए भी कर रहे हैं, उनके संकल्प की गहराई और निस्वार्थ भावना को दर्शाता है। अन्नपूर्णा मुहिम के लिए दिल्ली राज्य के सेवादारों का संपर्क सूत्र 999260 081 9268475242 999260 081398217 0236 मुनिंद्र धर्मार्थ ट्रस्ट संत रामपाल जी

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *