मध्य प्रदेश के इंदौर जिले की सावेर तहसील का एक छोटा सा गांव है — हतूनिया। खेतों और कच्ची गलियों के बीच बसा यह गांव बाहर से देखने में भले ही साधारण लगता हो, लेकिन यहां की जिंदगी में संघर्ष की कई अनकही कहानियां छिपी हुई हैं।
इन्हीं कहानियों में से एक कहानी है मांगी बाई की — एक बुजुर्ग महिला, जिनकी उम्र लगभग सत्तर वर्ष के आसपास है। जीवन के इस पड़ाव पर जब आमतौर पर लोग अपने बच्चों और परिवार के साथ सुकून के दिन बिताते हैं, मांगी बाई के हिस्से में आया है अकेलापन, गरीबी और संघर्ष।
गांव के एक कोने में उनका छोटा सा घर है। घर क्या, एक कमरा, कुछ पुराने बर्तन, एक छोटा सा चूल्हा और टूटा-फूटा दरवाजा, यही उनकी पूरी दुनिया है।
लेकिन हाल ही में इस छोटे से घर में एक नई हलचल हुई। कुछ लोग यहां पहुंचे। हाथों में राशन की बोरियां, दिल में सेवा की भावना और संदेश लेकर कि अब मांगी बाई अकेली नहीं हैं। यह मदद आई संत रामपाल जी महाराज द्वारा चलाई जा रही अन्नपूर्णा मुहिम के माध्यम से, जिसने इस बुजुर्ग महिला के जीवन में एक नई उम्मीद जगा दी।
एक कमरा, कुछ बर्तन और लंबा अकेलापन, मांगी बाई की जिंदगी का सच्चा चित्र
जब हम मांगी बाई के घर के अंदर जाते हैं तो वहां का दृश्य बहुत कुछ कह देता है।
दरवाजे की जगह प्लास्टिक का एक कमजोर सा गेट लगा हुआ है। अंदर प्रवेश करते ही एक छोटा सा कमरा दिखाई देता है। यही कमरा उनका सोने का स्थान, रसोई और जीवन का पूरा संसार है। कमरे के एक कोने में मिट्टी का छोटा सा चूल्हा रखा है। पास में कुछ बर्तन जिनकी संख्या गिनती में ही पूरी हो जाती है। ऊपर एक छोटा सा पंखा लगा है, जो शायद गर्मी के दिनों में थोड़ी राहत देता होगा। कमरे से थोड़ा आगे एक छोटा सा लेट-बाथ बना हुआ है। घर की दीवारों और दरवाजे की हालत साफ बताती है कि यह घर लंबे समय से किसी मरम्मत या देखभाल से दूर रहा है।
गांव वालों के अनुसार मांगी बाई कई वर्षों से पूरी तरह अकेले रह रही हैं। जब उनसे पूछा गया कि घर में कितने लोग हैं, तो उन्होंने बेहद शांत आवाज में कहा “मैं अकेले रहती हूं।” यह जवाब छोटा जरूर था, लेकिन उसमें छिपा हुआ दर्द बहुत गहरा था।
“पांच किलो राशन से ही महीना चलाती हूं” — संघर्ष की सच्चाई
जब मांगी बाई से पूछा गया कि उनका गुजारा कैसे चलता है, तो उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से मिलने वाला पांच किलो राशन ही उनके जीवन का सहारा है।
लेकिन क्या वह पर्याप्त होता है?
मांगी बाई ने सिर हिलाते हुए कहा —
“नहीं, उससे पूरा नहीं चलता… जैसे-तैसे करना पड़ता है।” बीमारी के समय उनकी परेशानी और बढ़ जाती है। अस्पताल जाना हो, दवा लेनी हो या रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करनी हों, सब कुछ उनके लिए चुनौती बन जाता है।
जब उनसे पूछा गया कि क्या इससे पहले कोई उनकी मदद के लिए आया था, तो उनका जवाब था “कोई नहीं आया।” उनकी आंखों में उस समय वर्षों का अकेलापन झलक रहा था।
जब अन्नपूर्णा मुहिम पहुंची हतूनिया गांव
इसी बीच संत रामपाल जी महाराज के अनुयायियों को गांव के कुछ लोगों के माध्यम से मांगी बाई की स्थिति के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद संत रामपाल जी महाराज जी के आदेश पर अन्नपूर्णा मुहिम के तहत उनके घर तक राहत सामग्री पहुंचाने का निर्णय लिया गया। कुछ ही समय बाद संत रामपाल जी महाराज के सेवादारों की एक टीम गांव हतूनिया पहुंची। गांव के लोग भी यह देखने के लिए जुट गए कि आखिर यह सहायता क्या है और किस प्रकार की है। सेवादारों ने मांगी बाई को पूरा मासिक राशन पैकेज उपलब्ध कराया।
राहत सामग्री में क्या-क्या मिला, जरूरत की हर चीज का ख्याल
अन्नपूर्णा मुहिम के तहत मांगी बाई को जो राहत सामग्री दी गई, उसमें रोजमर्रा की लगभग हर जरूरी चीज शामिल थी।
इस पैकेज में शामिल था:
- 15 किलो आटा
- 5 किलो चावल
- आलू और प्याज
- 1 लीटर खाने का तेल
- अचार
- काले चने
- चना दाल, पीली मूंग दाल, हरी मूंग दाल
- शक्कर (2 किलो)
- चाय पत्ती
- लाल मिर्च, हल्दी, जीरा, नमक
- दूध पाउडर
- कपड़े धोने का साबुन
- नहाने का साबुन
यानी यह सिर्फ एक प्रतीकात्मक मदद नहीं थी, बल्कि पूरे महीने की जरूरतों को ध्यान में रखकर दिया गया राशन था।
“अब हर महीने राशन मिलेगा” सेवा की निरंतरता का आश्वासन
संत रामपाल जी महाराज ने केवल एक बार राशन देकर अपना कर्तव्य पूरा नहीं माना।
उन्होंने मांगी बाई को एक विशेष कार्ड भी पहुंचाया, जिसके माध्यम से वह जरूरत पड़ने पर संपर्क कर सकेंगी।
सेवादारों ने बताया कि जैसे ही राशन खत्म होने के करीब आएगा, मांगी बाई फोन करके सूचना दे सकती हैं और उन्हें फिर से राशन उपलब्ध कराया जाएगा।
इसका मतलब है कि यह सहायता एक बार की नहीं बल्कि लगातार चलने वाली सेवा है। अन्नपूर्णा मुहिम के तहत प्रदान की जाने वाली राहत सामग्री पूरी तरह निःशुल्क है, परंतु इसके लिए कुछ स्पष्ट नियम निर्धारित किए गए हैं। सेवादारों के अनुसार यह सहायता केवल उन्हीं जरूरतमंद परिवारों को दी जाती है जो पूर्ण रूप से नशामुक्त जीवन अपनाते हों और मांस या किसी भी प्रकार की अभक्ष वस्तुओं का सेवन न करते हों। यदि कोई लाभार्थी इन शर्तों का पालन नहीं करता, तो उसे सहायता प्राप्त करने से पहले इन बुराइयों का त्याग करना आवश्यक होता है। साथ ही, यदि राहत सामग्री प्राप्त करने के बाद नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो सहायता तुरंत बंद कर दी जाती है।
पड़ोसियों की नजर में मांगी बाई की जिंदगी
गांव के पड़ोसी संदीप बताते हैं कि मांगी बाई कई सालों से अकेले रह रही हैं।
उन्होंने कहा — “इनकी दो बेटियां हैं, लेकिन उनकी शादी हो चुकी है। तब से माता जी अकेले ही रह रही हैं।” जब उनसे पूछा गया कि उनका गुजारा कैसे चलता है, तो उन्होंने बताया, “कभी-कभी स्कूल में झाड़ू-पोछा का काम कर लेती हैं। कभी काम मिल जाता है, कभी नहीं।” राशन के बारे में उन्होंने कहा, “सरकार से जो मिलता है उससे कभी-कभी घर चल जाता है, कभी मुश्किल हो जाती है।” गांव के एक अन्य निवासी राम सिंह ने कहा कि उन्होंने पहली बार ऐसा देखा है कि कोई संत या संगठन गांव-गांव जाकर जरूरतमंदों की तलाश कर रहा है। उन्होंने कहा, “आज तक ऐसा नहीं देखा कि कोई घर-घर पूछे कि किसे क्या जरूरत है। यह पहली बार देखा है।” गांव के कई लोगों ने कहा कि यदि इस प्रकार की मुहिम हर गांव तक पहुंचे तो कई गरीब परिवारों का जीवन बदल सकता है।
सेवा, करुणा और समाज सुधार का संदेश, संत रामपाल जी महाराज का प्रयास
अन्नपूर्णा मुहिम केवल भोजन बांटने का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह मानवता और सेवा का एक बड़ा अभियान है। संत रामपाल जी महाराज लंबे समय से समाज में व्याप्त गरीबी, नशा और अज्ञानता के खिलाफ काम कर रहे हैं। उनके अनुयायी गांव-गांव जाकर जरूरतमंद लोगों की पहचान करते हैं और उन्हें भोजन, कपड़ा, शिक्षा और अन्य जरूरी सहायता प्रदान करते हैं। इस मुहिम का उद्देश्य केवल पेट भरना नहीं, बल्कि समाज को यह संदेश देना है कि मानवता का सबसे बड़ा धर्म है जरूरतमंद की मदद करना।
संत रामपाल जी महाराज की प्रेरणा से चल रही यह सेवा बताती है कि सच्चा संत वही होता है जो समाज के दुख को अपना दुख समझे और बिना किसी स्वार्थ के लोगों की सहायता करे।
नशामुक्त और सदाचारी जीवन की शर्त
अन्नपूर्णा मुहिम के तहत सहायता प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण शर्त भी रखी गई है। लाभार्थी को नशामुक्त और मांसाहार मुक्त जीवन जीना होगा। यदि कोई व्यक्ति नशा करता है या मांसाहार करता है, तो उसे पहले इन बुराइयों को छोड़ना होगा। इस नियम का उद्देश्य केवल सहायता देना नहीं बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाना भी है। इस अभियान के तहत केवल भोजन ही नहीं, बल्कि गरीब बच्चों की शिक्षा का भी ध्यान रखा जाता है।
जो बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और जिनके परिवार किताबें, ड्रेस या अन्य जरूरी सामग्री नहीं खरीद सकते, उन्हें यह सभी चीजें निशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं। इस तरह यह मुहिम केवल वर्तमान की भूख मिटाने का नहीं बल्कि भविष्य को बेहतर बनाने का प्रयास भी है।
टूटे परिवार से नई उम्मीद तक — इंसानियत की जीत
हतूनिया गांव की उस छोटी सी झोपड़ी में आज एक बदलाव दिखाई देता है। जहां कभी केवल सन्नाटा और संघर्ष था, वहां अब उम्मीद की हल्की-सी रोशनी दिखाई दे रही है। मांगी बाई के चेहरे पर अब वह थकान नहीं दिखती जो कुछ समय पहले तक साफ नजर आती थी। उन्होंने मुस्कुराते हुए संत रामपाल जी महाराज जी के लिए कहा — “बहुत अच्छा काम कर रहे हैं… भगवान उन्हें खुश रखे।”
यह मुस्कान बताती है कि कभी-कभी छोटी सी मदद भी किसी की पूरी दुनिया बदल सकती है। जब समाज अक्सर चुप हो जाता है, जब सरकारी योजनाएं हर जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पातीं, तब कहीं-कहीं से सच्ची सेवा का हाथ आगे बढ़ता है। और यही हाथ किसी टूटे हुए जीवन में फिर से उम्मीद जगा देता है। हतूनिया गांव की यह कहानी हमें यही बताती है की जब कोई नहीं सुनता तब भगवान सुनते हैं। और संत रामपाल जी महाराज ने जिस तरह गरीबों, भूखों, असहायों और किसानों, मजदूरों के लिए किया है उसका पूरा विश्व कभी सदैव ऋणी रहेगा।

