रामनगर: अंधे बेटे और मां की पीड़ा, अन्नपूर्णा मुहिम बनी जीवन की रोशनी

जंगल की झोपड़ी से उठी पुकार और अन्नपूर्णा मुहिम की मानवीय रोशनी

उत्तराखंड के रामनगर के घने जंगलों से सटे एक दुर्गम इलाके में यह कहानी जन्म लेती है ऐसी कहानी, जो कागजों में नहीं, बल्कि जमीन पर लिखी गई है। यह कहानी है लगभग 60 वर्ष की एक वृद्ध माता, उनके दृष्टिहीन बेटे और उस झोपड़ी की, जिसे घर कहना भी मुश्किल है।

चारों ओर जंगल, कच्चे रास्ते, नमी से भरी हवा और जंगली जानवरों का डर, इसी वातावरण में यह माता और उनका अंधा बेटा पिछले दो दशकों से रह रहे हैं। उनका अपना कोई मकान नहीं है। वे दूसरों के बाग में बनी एक अस्थायी झोपड़ी में रहते हैं, जहां रहने की अनुमति भी मजदूरी से जुड़ी शर्तों पर निर्भर है “काम करोगे तो रहोगे, नहीं तो निकाल दिए जाओगे।” वह झोपड़ी भी जर्जर स्थिति में है। वेंटलेशन की कोई सुविधा नहीं है किसी तरह टाट और पन्नी के जुगाड़ से वे रहते हैं।

माता के पति 20–25 साल पहले गुजर चुके हैं। तीन बच्चों में एक बेटी पंजाब में ब्याही है, जो खुद घरेलू हिंसा और गरीबी से जूझ रही है; दूसरा बेटा अलग हो चुका है और मां की कोई सुध नहीं लेता; तीसरा बेटा दृष्टिहीन है और पूरी तरह मां पर निर्भर है।

माता का शरीर बीमारियों से जर्जर हो चुका है। हाथ-पैरों में लगातार दर्द रहता है, फिर भी उन्हें दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ती है, वरना राशन नहीं मिलता, दवा नहीं मिलती, और झोपड़ी में रहने की इजाजत भी नहीं मिलती। बारिश में छत टपकती है, पन्नी फट चुकी है, बिजली नहीं है, गैस नहीं है, शौचालय नहीं है। सांप अक्सर झोपड़ी में घुस आते हैं। कई रातें डर के मारे दोनों मां-बेटे बाहर बैठकर गुजारते हैं।

कई बार बारिश में खाना नहीं बन पाता और दोनों भूखे ही सो जाते हैं। बेटा कहता है, “मां, बारिश रुक जाए तो सुबह रोटी बना लेना।” यही उनकी रोजमर्रा की जिंदगी है।

इसी निराशा के अंधेरे में अचानक एक रोशनी दिखाई दी संत रामपाल जी महाराज द्वारा संचालित अन्नपूर्णा मुहिम।

दुख के दरवाजे पर दस्तक: कैसे पहुंची अन्नपूर्णा मुहिम

दो दिन पहले ही संत रामपाल जी महाराज के सेवादारों को इस परिवार के बारे में सूचना मिली। बताया गया कि जंगल के भीतर एक वृद्ध माता अपने दृष्टिहीन बेटे के साथ अमानवीय परिस्थितियों में जी रही हैं।

सूचना मिलते ही, संत रामपाल जी महाराज के आदेश पर मुनिंद्र धर्मार्थ ट्रस्ट की टीम तुरंत राहत सामग्री लेकर मौके पर पहुंची। यह कोई औपचारिक दौरा नहीं था बल्कि सीधे जमीन पर उतरकर किया गया मानवीय कल्याणकार्य था।

टीम जब झोपड़ी में घुसी, तो वहां की हालत देखकर उनके शब्द भी लड़खड़ा गए न वेंटिलेशन, न रोशनी, जगह-जगह फटी पन्नी, कच्ची जमीन, उमस और घुटन। फिर भी माता ने उन्हें विनम्रता से नमस्कार किया और अपनी कहानी सुनाई।

मां की जुबानी दर्द की दास्तान

माता ने रोते हुए बताया,  “हमारा अपना घर नहीं है। काम करेंगे तो रहने देंगे, नहीं तो भगा देंगे। मेरे हाथ-पैरों में दर्द रहता है, पर काम किए बिना गुजारा नहीं। मैं दवा खाकर काम करती हूँ।”

उन्होंने बताया कि बारिश में सब कुछ भीग जाता है कपड़े, बिस्तर, राशन। गैस नहीं है; वे जंगल से गीली लकड़ियां बीनकर चूल्हा जलाती हैं। कई बार आग ही नहीं जलती और खाना नहीं बनता।

उनका दृष्टिहीन बेटा अक्सर भूखा सो जाता है। इलाज के पैसे नहीं हैं। बिजली का कनेक्शन नहीं है। पानी दूर जंगल के किनारे से लाना पड़ता है। शौचालय नहीं है। वहीं खाना बनती है और थोड़ी दूर पर ही नहा धो लेती  हैं। माता ने बताया “आज तक हमारी मदद करने कोई नहीं आया। सब मांगने वाले आते हैं, देने वाला कोई नहीं।” यह वाक्य पूरे समाज के लिए आईना था।

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राहत कार्य का विवरण: पेट भरने से आगे की मदद

अन्नपूर्णा मुहिम के तहत इस परिवार को व्यापक राहत सामग्री दी गई, जिसमें शामिल थे:

क्र.सं.सामग्रीमात्रा
1आटा20 किलो
2चावल5 किलो
3चीनी2 किलो
4मूंग दाल1 किलो
5चना दाल1 किलो
6आलू5 किलो
7प्याज5 किलो
8तेल1 लीटर
9नमक1 किलो
10चाय पत्ती1 पैकेट
11दूध पाउडर1 पैकेट
12हल्दी1 पैकेट
13लाल मिर्च1 पैकेट
14जीरा1 पैकेट
15धनिया1 पैकेट
16अचार1 किलो
17कपड़े धोने का साबुन1 पैकेट
18नहाने का साबुन1 पैकेट


सेवादारों ने यह भी बताया कि यह केवल एक बार की मदद नहीं है। जब तक माता और उनके बेटे के पास स्थायी आय और सुरक्षित आवास नहीं होगा, तब तक हर महीने सहायता जारी रहेगी।

इसके अलावा:

  • माता और बेटे के इलाज का खर्च संत रामपाल जी महाराज उठाएंगे।
  • भविष्य में रहने के लिए सुरक्षित मकान की व्यवस्था पर विचार किया जाएगा।
  • रोजमर्रा की जरूरत की चीजें लगातार दी जाएंगी।
  • उन्हें संपर्क नंबर वाला कार्ड दिया गया ताकि जरूरत पड़ते ही मदद मांगी जा सके।

रामनगर गांव और इलाके के लोगों की प्रतिक्रियाएं

आस-पास के ग्रामीण भी इस घटना से प्रभावित हुए। कई लोगों ने स्वीकार किया कि उन्होंने पहले कभी इस परिवार की इतनी गंभीर स्थिति पर ध्यान नहीं दिया था।

एक पड़ोसी ने कहा “हम जानते थे कि वे गरीब हैं, लेकिन इतना बुरा हाल होगा, यह नहीं पता था। आज संत रामपाल जी महाराज ने जो किया, वह कोई साधारण आदमी नहीं कर सकता।”

कुछ लोगों ने कहा कि यह मदद उन्हें भी प्रेरित करेगी कि वे अपने आसपास के जरूरतमंदों को नजरअंदाज न करें। इलाके में यह चर्चा फैल गई कि जंगल के भीतर भी कोई जरूरतमंद भूखा नहीं रहेगा, जब तक अन्नपूर्णा मुहिम सक्रिय है।

संत रामपाल जी महाराज की समर्पित प्रशंसा

संत रामपाल जी महाराज को केवल संत नहीं, बल्कि करुणा का जीवंत रूप हैं। उन्होंने अन्नपूर्णा मुहिम के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि आध्यात्म केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि झोपड़ियों में भी उतर सकता है। वे अपने सत्संगों में बार-बार कहते हैं, “हम एक रोटी कम खा लेंगे, लेकिन किसी को भूखा नहीं सोने देंगे।”

उनकी दृष्टि केवल भोजन बांटने तक सीमित नहीं है; वे शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और नैतिक जीवन पर भी जोर देते हैं। नशामुक्त और सात्विक जीवन को उन्होंने इस मुहिम की मूल शर्त बनाया है, ताकि मदद पाने वाला व्यक्ति आत्मनिर्भर और अनुशासित बने।

इस घटना ने दिखाया कि संत रामपाल जी महाराज की सेवा केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उनके द्वारा किए गए जनहित के कार्यों में प्रकट होती है दूर जंगलों तक पहुंचकर, एक पिता की तरह सबसे टूटे हुए लोगों को गले लगाकर।

सामाजिक प्रभाव: डर से भरोसे तक का सफर

इस राहत कार्य का असर केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहा। पूरे इलाके में यह संदेश गया कि जरूरतमंदों के लिए मदद उपलब्ध है। कई लोगों ने नशा छोड़ने और मांसाहार त्यागने की बात कही, क्योंकि मुहिम के नियमों के अनुसार सहायता केवल सात्विक जीवन जीने वालों को दी जाती है। इससे स्थानीय स्तर पर अनुशासन, स्वास्थ्य जागरूकता और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना बढ़ी है। लोग अब एक-दूसरे की मुश्किलों पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं।

अन्नपूर्णा मुहिम के नियम और पारदर्शिता

राहत पाने के लिए स्पष्ट नियम तय किए गए हैं:

  1. लाभार्थी को नशामुक्त होना होगा।
  2. मांस या अभक्ष वस्तुओं का सेवन वर्जित है।

नियमों का उल्लंघन करने पर सहायता तुरंत बंद कर दी जाएगी। यह व्यवस्था मदद को व्यवस्थित, निष्पक्ष और टिकाऊ बनाती है।

माता की आंखों में नई उम्मीद

जब राहत सामग्री आई, तो माता बार-बार रो पड़ीं। उन्होंने कहा- “आज हमारे घर भगवान आ गए हैं। मंदिरों में पूजा करते-करते मेरे पति गुजर गए, पर भगवान नहीं मिले। आज मिले हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि अब वे संत रामपाल जी महाराज के आश्रम जाएंगी। उनके लिए यह सिर्फ राशन नहीं था यह सुरक्षा, सम्मान और अपनापन था। उन्होंने कहा कि मंदिरों की पूजा करते करते मैं मर गई पर कोई नहीं आया। संत रामपाल जी महाराज ही भगवान हैं। आज अन्नदेवता स्वयं चलकार मेरी झोपड़ी में आए हाईं।

नर्क से स्वर्ग की ओर एक कदम

यह घटना बताती है कि सच्ची सेवा वही है जो सबसे दूर, सबसे टूटे और सबसे अकेले लोगों तक पहुंचे। जंगल की झोपड़ी में रहने वाली यह माता और उनका बेटा अब अकेले नहीं हैं। उनके पास भोजन है, भरोसा है और भविष्य की उम्मीद है।

अन्नपूर्णा मुहिम ने दिखाया कि जब करुणा, संगठन और आस्था एक साथ आती हैं, तो टूटे जीवन भी फिर खड़े हो सकते हैं। ब्राह्मणवास से लेकर रामनगर के जंगलों तक यह संदेश साफ है: कोई भी भूखा नहीं रहेगा, कोई भी बेसहारा नहीं छूटेगा। और इसी संकल्प के साथ संत रामपाल जी महाराज द्वारा चलाई गई अन्नपूर्णा मुहिम उनके निर्देशन में आगे बढ़ रही है, एक-एक झोपड़ी, एक-एक परिवार और एक-एक भूखे पेट तक पहुंचते हुए।

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