बरियौल गांव की कच्ची गलियों में सुबह की हल्की धूप उतर रही थी। हवा में धुएं और मिट्टी की मिली-जुली गंध थी। कहीं दूर से चूल्हे की आंच पर चढ़ी दाल की खनक आती थी, तो कहीं सूने आंगन में पसरा सन्नाटा बोल रहा था। इसी सन्नाटे के बीच एक छोटा-सा आंगन जिसकी छत नहीं, बस खुला आसमान और उसी के कोने में बैठी साठ बरस की एक बुज़ुर्ग महिला। आंखों में वर्षों से अंधेरा, मगर चेहरे पर आज एक अनकही रोशनी। यही हैं सियाराम माई।
यह रिपोर्ट किसी स्टूडियो की ठंडी रोशनी में नहीं, गांव की मिट्टी से निकली है जहां हर सांस संघर्ष है, और हर मुस्कान उम्मीद।
जहां आंखों की रोशनी नहीं, वहां एहसास रास्ता बनाते हैं
सियाराम माई की दुनिया आंखों से नहीं, एहसास से चलती है। बचपन में ही, दस साल की उम्र में, उनकी आंखों की रोशनी चली गई। माता-पिता जब तक रहे, सहारा रहे। उनके जाने के बाद सियाराम माई का जीवन सरकारी पेंशन (कभी 300, कभी 600, कभी 900 रुपये, ) और पड़ोस की दया पर टिका रहा।
उनका घर? अपना नहीं। भाई की ज़मीन पर एक छोटा-सा ठिकाना। बरसात में ऊपर से पानी टपकता है, धूप में नीचे की ज़मीन तपती है। चूल्हा खुले आंगन में, जलावन पत्तों से। खाना, एक बार बना, तो वही शाम और वही अगली सुबह। कई बार तो पड़ोस के आंगन की देहरी ही सहारा बनती है।
“एक ही शाम बनाते हैं, माई… वही खा लेते हैं”, पीड़ित परिवार की स्थिति
यह पूछे जाने पर कि “माई, कैसे गुजर होती है?” वे धीमे स्वर में बोलीं- “मां-बाप रहे, तो जिंदा रहे। अब… एक ही शाम बनाते हैं। वही खा लेते हैं। कभी किसी के आंगन से मिल गया, तो ठीक। नहीं तो कच्चा-पक्का जो मिल जाए।” उनके शब्दों में शिकायत नहीं, बस आदत-सी पीड़ा थी। आंखें नहीं देख पातीं, मगर हर कदम गिन-गिनकर उठाती हैं। पानी भरना, चूल्हा सुलगाना, सब कुछ अंदाज़े से। उनके पास कोई बेटा नहीं, कोई स्थायी सहारा नहीं।
खामोश आंगन में जब कदमों की आहट आई
यह बेबसी का अंधेरा उनकी आंखों के अंधेरे से भी ज्यादा गहरा था। पर कहते हैं जहां इंसान की हद खत्म होती है वहां परमात्मा की दया शुरू होती है। एक दिन उनके खामोश आंगन में कुछ नए कदमों की आहट हुई। यह आवाजें अनजान थी पर उनमें अपनेपन की एक ऐसी मिठास थी जो सियाराम माई ने बरसों से नहीं सुनी थी। वह संत रामपाल जी महाराज के सेवक थे। वह मदद नहीं सम्मान लेकर आए थे। वह भीख नहीं परमात्मा का प्रसाद लेकर आए थे। संत रामपाल जी महाराज की अन्नपूर्णा मुहिम के सेवादार आए थे।
जब सियाराम माई के हाथों ने चावल के पैकेट की खनक महसूस की, दाल-तेल की थैली टटोली, और नए कपड़ों की नरमी छुई—उनके चेहरे पर एक गहरी, शांत मुस्कान फैल गई। वह मुस्कान सिर्फ पेट भरने की नहीं थी; वह तन ढकने के सम्मान और मन के स्वाभिमान की मुस्कान थी। यह मुस्कान सिर्फ पेट भरने की आस नहीं थी। यह तन ढकने का सम्मान भी था। यह उस एहसास की मुस्कान थी कि वह अकेली नहीं है।
देख तो वो नहीं सकती थी। पर उस दिन उन्होंने अपनी आत्मा से सब कुछ देख लिया। उन्होंने महसूस किया कि कोई है जो उन्हें बोझ नहीं समझता। संत रामपाल जी महाराज की यह अन्नपूर्णा मुहिम सिर्फ पेट की आग नहीं बुझाती। यह सियाराम माई जैसी आत्माओं के तन को वस्त्र और मन को स्वाभिमान देती है।
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राहत कार्य का पूरा विवरण: क्या-क्या, कितना-कितना
सेवादारों ने सामग्री व्यवस्थित ढंग से सौंपी।
| क्र.सं. (S. No.) | सामग्री (Product) | मात्रा (Quantity) |
| खाद्य सामग्री | ||
| 1 | चावल | 15 किलो |
| 2 | सरसों का तेल | 1 लीटर |
| 3 | आलू | 2.5 किलो |
| 4 | प्याज | 2.5 किलो |
| 5 | मूंग दाल (पीली) | 0.5 किलो (500 ग्राम) |
| 6 | मूंग दाल (हरी) | 0.5 किलो (500 ग्राम) |
| 7 | चना दाल | 0.5 किलो (500 ग्राम) |
| 8 | काला चना | 0.5 किलो (500 ग्राम) |
| 9 | नमक | 1 किलो |
| 10 | हल्दी | 150 ग्राम |
| 11 | सूखी लाल मिर्च | 100 ग्राम |
| 12 | जीरा | 150 ग्राम |
| घरेलू व अन्य | ||
| 13 | नहाने का साबुन | 4 नग |
| 14 | कपड़े धोने का साबुन/सर्फ | 1 किलो |
| 15 | ड्रम, बक्सा, प्लास्टिक डिब्बे | 1 सेट (भंडारण हेतु) |
| 16 | त्रिपाल (बरसात से बचाव हेतु) | 1 |
| 17 | साड़ियां | 2 (एक जोड़ी) |
यह सिर्फ एक दिन की राहत नहीं—यह जीवन की डोर थामने का वादा है।
निरंतरता और भविष्य का आश्वासन
सियाराम माई को एक संपर्क कार्ड दिया गया—जिस पर नजदीकी सेवादार का नाम और नंबर है। उन्हें कहा गया कि सामग्री खत्म होने से दो दिन पहले फोन करें—नई पैकिंग पहुंच जाएगी।
सेवादारों ने स्पष्ट कहा—“माई जब तक इस धरती पर हैं, सहायता जारी रहेगी।”
गुरुजी का आदेश है कि जब तक कोई खुद सक्षम न हो जाए, तब तक सहायता रुके नहीं। समाज में सबसे पहले उन लोगों की मदद की जाए जो सच में असहाय और मजबूर हैं—जिनका कोई सहारा नहीं, जो भूख, बीमारी, अपंगता या बुढ़ापे से जूझ रहे हैं। संत रामपाल जी महाराज का स्पष्ट संदेश है कि सेवा दिखावे के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत और करुणा के भाव से होनी चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति भूख, अभाव और अपमान के साथ जीवन जीने को मजबूर न हो।
जेल में होते हुए भी यह सेवा कैसे?
सेवादार बताते हैं कि एक समय गुरुजी ने अख़बार में यह खबर पढ़ी थी कि सिर्फ भोजन के अभाव में एक पूरे परिवार ने आत्महत्या कर ली। उस खबर ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने कहा था—“अगर इस देश में अन्न की कमी से कोई जान दे रहा है, तो यह समाज और धर्म—दोनों के लिए कलंक है।” उसी क्षण उन्होंने तय कर लिया कि जब तक सांस है, कोई गरीब भूखा नहीं सोएगा। जेल में जाने के बाद भी यह संकल्प कमजोर नहीं पड़ा।
बरियौल गांव की आवाज़: सरपंच, पड़ोसी और नौजवान
पड़ोसी कहते हैं—“पहले माई कभी इधर, कभी उधर से रोटी लाती थीं। अब कम से कम चिंता नहीं। सामान है, इज़्ज़त है। एक नौजवान बोला— “देखकर अच्छा लगा। नेत्रहीन होकर भी अब उन्हें अकेलापन नहीं लगेगा।” गांव में यह चर्चा आम है कि सेवा अगर हो, तो ऐसी—जो सम्मान बचाए। गांव वालों की बातों में कोई बनावट नहीं थी, न ही कोई तैयार किया हुआ बयान—जो बोला गया, वह सीधे दिल से निकला हुआ सच था। एक बुज़ुर्ग पड़ोसी ने कहा, “माई तो बरसों से ऐसे ही जी रही थीं। कभी किसी के यहां से रोटी मिल गई, तो ठीक, नहीं तो भूखी सो जाती थीं।
आंखों से दिखता नहीं, फिर भी किसी से शिकायत नहीं करती थीं।” गांव की महिलाओं ने बताया कि बरसात में उनका हाल सबसे बुरा हो जाता था—छत नहीं, खुला आंगन, और फिसलन भरी ज़मीन। एक युवक बोला, “हम लोग रोज़ देखते थे, लेकिन सच कहें तो कोई स्थायी मदद नहीं कर पाया। आज पहली बार लगा कि कोई है जो सिर्फ एक दिन नहीं, हमेशा के लिए साथ खड़ा है।”
सरपंच और बुज़ुर्गों ने भी माना कि संत रामपाल जी महाराज की अन्नपूर्णा मुहिम ने गांव में भरोसे की एक नई लकीर खींची है—“ऐसी सेवा पहले कभी नहीं देखी, जहां सामान भी मिले और यह भरोसा भी कि कल फिर जरूरत पड़ी तो कोई आएगा।” गांव वालों की आंखों में राहत थी और आवाज़ में सुकून—क्योंकि सियाराम माई की मदद के साथ-साथ उन्हें यह यकीन भी मिला कि इंसानियत अभी ज़िंदा है।
नियम व सूचना: अन्नपूर्णा मुहिम
यदि कोई मांसाहार करता है तो उसे राहत सामग्री प्राप्त करने से पूर्व इन सभी बुराइयों को त्यागना अनिवार्य होगा। यदि कोई लाभार्थी द्वारा सामग्री प्राप्त करने के पश्चात नशा अथवा मांस आदि का सेवन करते हुए पाया गया तो उसकी सहायता तुरंत प्रभाव से बंद कर दी जाएगी। संत रामपाल जी महाराज के द्वारा गरीब असहाय और जरूरतमंद परिवारों के लिए निशुल्क खाद्य सामग्री वितरण का कार्य किया जाता है। राहत सामग्री केवल पूर्ण नशामुक्त जीवन जीने वालों को ही दी जाती है। इसलिए मांसाहार/अभक्ष का त्याग अनिवार्य है और नियम उल्लंघन पर सहायता रोकी जा सकती है।
संत रामपाल जी महाराज हैं कबीर परमात्मा के अवतार
संत रामपाल जी महाराज ने जो कार्य शुरू किया है, वह केवल सेवा नहीं बल्कि समाज के लिए एक नई सोच और नई दिशा है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि सच्चा धर्म मंदिरों या प्रवचनों तक सीमित नहीं होता, बल्कि भूखे पेट को रोटी, नंगे तन को कपड़ा और टूटे मन को सम्मान देना ही असली भक्ति है। अन्नपूर्णा मुहिम के माध्यम से उन्होंने उन लोगों तक हाथ बढ़ाया है जिनकी तरफ समाज अक्सर देखना भी भूल जाता है—नेत्रहीन बुज़ुर्ग, असहाय महिलाएं, अनाथ बच्चे और बेहद गरीब परिवार। खास बात यह है कि यह मदद एक बार की नहीं, बल्कि तब तक चलने वाली है जब तक व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए।
जेल में रहते हुए भी इतनी सुव्यवस्थित, अनुशासित और करुणा से भरी सेवा का संचालन यह दिखाता है कि वे साधारण संत नहीं हैं। जब समाज चुप हो जाता है, तब सच्ची सेवा बोलती है। सियाराम माई की कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं—यह उस भरोसे की कहानी है, जो अंधेरे में भी रास्ता दिखा देता है। आज उनके आंगन में सिर्फ राशन नहीं आया आज उम्मीद आई है।

