मध्य प्रदेश के जिला रायसेन की तहसील देवरी बरसात के दिनों में कीचड़ से भरी गलियां, टूटी पगडंडियां और दूर से दिखाई देती एक जर्जर सी झोपड़ी। यही वह जगह है, जहां एक परिवार अपनी जिंदगी की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहा था। यह कोई साधारण गरीबी की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस दर्द की कहानी है, जिसमें आंखों की रोशनी नहीं, लेकिन जिम्मेदारियों का पहाड़ है। पेट की भूख है, लेकिन कमाने का कोई जरिया नहीं। जब हमारी टीम इस परिवार तक पहुंची, तो जो तस्वीर सामने आई, वह सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि दिल में चुभने वाली सच्चाई थी।
चार दीवारों में कैद एक संघर्ष – जहां रोशनी नहीं, लेकिन जिम्मेदारियां बहुत हैं
इस छोटे से घर में कुल पांच सदस्य रहते हैं, जिसमें पति-पत्नी, उनके दो छोटे बच्चे और एक बुजुर्ग दादी है। लेकिन इस परिवार की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि पति-पत्नी दोनों ही जन्म से नेत्रहीन हैं। घर की हालत देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां जिंदगी कितनी मुश्किल है। लकड़ी और टीन से बना यह घर बरसात में टपकता है। चारों तरफ से पानी अंदर आ जाता है।
एक छोटा सा कमरा, जिसमें खाना बनाना, सोना और रहना आदि होता है। घर में रखे डिब्बे खाली पड़े हैं। चूल्हा तो है, लेकिन जलाने के लिए कभी लकड़ी नहीं होती, तो कभी खाने के लिए अनाज नहीं। बुजुर्ग दादी, जिनकी उम्र अब काम करने की नहीं रही, वह भी उसी संघर्ष का हिस्सा हैं। बच्चों की उम्र 4 और 5 साल है। जब उन्हें खेलना और पढ़ना चाहिए, तब वे हालात से लड़ना सीख रहे हैं।
अंधेरे में घिरा जीवन: जब आंखों की रोशनी भी नहीं और कमाने वाला भी कोई नहीं
जब परिवार के मुखिया से बात की गई, तो उनकी आवाज में बेबसी साफ झलक रही थी। उन्होंने कहा, “हम दोनों को बचपन से दिखाई नहीं देता। घर में कमाने वाला कोई नहीं है। बच्चे छोटे हैं, मां बूढ़ी हैं, हम क्या करें समझ नहीं आता।”
गुजारे के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया, “पहले हमारा लड़का कबाड़ बिनता था । वही थोड़ी बहुत चीजें लाकर देता था और उसी से घर चलता था।”
यह सुनकर एक पल के लिए सन्नाटा छा जाता है। जहां एक पांच साल का बच्चा पढ़ाई के बजाय कूड़ा बीनकर परिवार चला रहा था।
बचपन का बोझ – जब खेल की उम्र में जिम्मेदारियां उठानी पड़ीं
छोटे से बच्चे से जब पूछा गया कि वह स्कूल जाता है या नहीं, तो उसने धीरे से कहा, “नहीं, मेरे पास ड्रेस और जूते नहीं हैं।”
यह सिर्फ एक जवाब नहीं था, बल्कि उस सच्चाई का आईना था, जहां गरीबी बच्चों के सपनों को शुरू होने से पहले ही रोक देती है। दूसरी कक्षा में पढ़ने की उम्र, लेकिन किताबों की जगह उस बच्चे के हाथ में कबाड़ का बोरा था।
अन्नपूर्णा मुहिम – जब मदद बनकर पहुंची एक उम्मीद
इसी बीच इस परिवार की जिंदगी में एक नई रोशनी आई। संत रामपाल जी महाराज द्वारा चल रही अन्नपूर्णा मुहिम के तहत उनकी मदद इस परिवार तक पहुंची। यह सिर्फ एक मदद नहीं थी, बल्कि एक टूटते हुए परिवार को संभालने की कोशिश थी।
राहत सामग्री का विस्तृत वितरण – हर जरूरत का ख्याल
इस मुहिम के तहत परिवार को जो सहायता दी गई, वह सिर्फ एक दिन का सहारा नहीं, बल्कि कई दिनों की राहत थी।
सामग्री में शामिल था:
- 25 किलो आटा
- 5 किलो चावल
- 2 किलो चीनी
- दाल और मूंग की दाल
- 1 किलो तेल
- नमक, हल्दी, मिर्च मसाले
- चाय, साबुन, डिटर्जेंट
- 5 किलो आलू और 5 किलो प्याज
- अचार और अन्य जरूरी सामान
बच्चों के लिए:
- स्कूल ड्रेस
- जूते
- बैग
- किताबें और कॉपियां
- परिवार के सभी सदस्यों के लिए नए कपड़े भी दिए गए।
संघर्ष से सपनों तक: अब बच्चे के हाथ में किताब होगी, कबाड़ नहीं
जब परिवार से पूछा गया कि अब क्या बदलाव आएगा, तो पिता की आवाज में उम्मीद साफ सुनाई दी। उन्होंने कहा, “अब हम कबाड़ नहीं बीनेंगे और हमारा बच्चा स्कूल जाएगा। पहले मजबूरी थी, अब अगर इतना सामान मिल रहा है तो हम उसे पढ़ाएंगे।”
यह वही परिवार था, जो कुछ समय पहले तक दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा था।
सिर्फ एक बार नहीं – हर महीने मदद का वादा
इस मुहिम की खास बात यह है कि यह एक बार की सहायता नहीं है। परिवार को एक कार्ड दिया गया, जिसमें संपर्क नंबर लिखे हैं। उन्हें बताया गया कि जब भी राशन खत्म हो, वे संपर्क करें, उन्हें फिर से सहायता पहुंचाई जाएगी। साथ ही, यह भी आश्वासन दिया गया कि:
- बच्चों की पढ़ाई जारी रखी जाएगी
- फीस और ड्रेस की व्यवस्था होगी
- बिजली कनेक्शन दिलाने में मदद की जाएगी
- गैस सिलेंडर भी उपलब्ध कराया जाएगा
जनता की आवाज: ‘गरीबों तक खुद पहुंच रही है मदद, ये है असली सेवा’
नगर परिषद के उपाध्यक्ष ने कहा कि यह एक बहुत बड़ी सेवा है। गरीबों की मदद करना काबिले तारीफ है। सरकार की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन ऐसे संत बिना शर्त मदद कर रहे हैं। यहां तक कि एक स्थानीय रिपोर्टर ने कहा कि उन्होंने पहले कभी नहीं देखा कि कोई संस्था गरीबों तक खुद जाकर उनकी मदद करे। यह एक बड़ी पहल है।
समाज में बदलाव की शुरुआत – जब मदद से सम्मान भी लौटता है
इस तरह की पहल सिर्फ पेट भरने तक सीमित नहीं रहती।
- यह लोगों के आत्मसम्मान को भी वापस लाती है।
- बच्चे अब स्कूल जाएंगे
- परिवार को भीख या कबाड़ पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा
- जीवन में आत्मविश्वास बढ़ेगा
यह बदलाव धीरे-धीरे पूरे समाज को प्रभावित करता है।
संत रामपाल जी महाराज – सेवा, करुणा और मानवता का एक उदाहरण
इस पूरी मुहिम के पीछे जो भावना है, वह सिर्फ सहायता नहीं, बल्कि मानवता की सच्ची सेवा है। संत रामपाल जी महाराज द्वारा शुरू की गई यह पहल उन लोगों तक पहुंच रही है, जिन्हें अक्सर समाज और व्यवस्था दोनों नजरअंदाज कर देते हैं।
उनका यह प्रयास यह दिखाता है कि सच्ची सेवा वही है, जिसमें बिना भेदभाव के जरूरतमंदों तक मदद पहुंचाई जाए। गरीबों के लिए भोजन, बच्चों के लिए शिक्षा, और परिवारों के लिए सम्मानजनक जीवन—इन सभी पहलुओं को साथ लेकर चलना इस मुहिम को खास बनाता है।
टूटे परिवार से नई उम्मीद तक – जब अंधेरे में भी रोशनी मिलती है
देवरी की उस छोटी सी झोपड़ी में अब सिर्फ गरीबी की कहानी नहीं है। अब वहां उम्मीद है, राहत है और एक नई शुरुआत की संभावना है। यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब समाज चुप हो जाता है, जब व्यवस्था कहीं पीछे रह जाती है, तब कहीं न कहीं से मदद का हाथ जरूर उठता है। इस बार संत रामपाल जी महाराज जी के रूप में भगवान ने उनकी मदद की। इस परिवार के लिए यह मदद सिर्फ राशन नहीं, बल्कि जिंदगी की नई राह है।

